महान सवतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की जीवनी | Biography of Subhash Chandra Bose

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सुभाष चंद्र बोस की जीवनी (Biography of Subhash Chandra Bose In Hindi) : नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानी में से एक थे उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सेना को पुनर्गठित किया और 1943 में आजाद हिंद फौज का गठन किया जिसकी शुरुआत 1942 में रासबिहारी बोस द्वारा की गई थी। सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता पूर्व अवधि के दौरान लेबर पार्टी के सदस्यों के साथ भारत के भविष्य पर चर्चा करने के लिए लंदन का दौरा किया था। लेकिन ताइवान से उनका अचानक गायब हो जाना एक अविश्वसनीय घटना थी। जिसमें से किसी की भी क्रमिक सरकारों द्वारा पूरी तरह से जांच नहीं की गई और भारत के अब तक के सबसे प्रिय नेताओं में से एक के बारे में लोगों को ऐसे अंधेरे में रखना बिल्कुल भी अच्छा नहीं है।

सुभाष चंद्र बोस का जीवन परिचय

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ था। इनके माता का नाम प्रभावती देवी और पिता का नाम जानकीनाथ बोस था। इनके पिता जानकीनाथ बोस कटक के एक सफल वकील थे जिन्होंने रायबहादुर की उपाधि भी प्राप्त की। इसके बाद वे बंगाल विधान परिषद के सदस्य बने।

सुभाष चंद्र बोस एक बहुत ही बुद्धिमान और इमानदार छात्र थे लेकिन खेलों में वे ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते थे। इन्होंने अपने b.a. की पढ़ाई प्रेसीडेंसी कॉलेज से  दर्शनशास्त्र में की। नेताजी स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं से बहुत प्रभावित थे और एक छात्र के रूप में देशभक्ति के उत्साह के लिए जाने जाते थे ।उन्होंने विवेकानंद को अपना अध्यात्मिक गुरु भी मान रखा था। इन्होंने अपने इंडियन सिविल सर्विस की तैयारी के लिए लंदन के कैंब्रिज यूनिवर्सिटी चले गया। लेकिन उन्हें सो 21 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर वह भारत वापस लौट आए और सिविल सर्विस की तैयारी अधूरी छोड़ दी। इसके बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए थे और देश को आजाद कराने की मुहिम का हिस्सा बन चुके थे।

अंग्रेजों द्वारा साथ ही भारतीय के शोषण के बारे में इतनी सारी घटनाओं को पढ़ने के बाद सुभाष चंद्र बोस ने बदला लेने का फैसला किया। उनके बारे में कहा जाता है कि 1916 में सुभाष चंद्र बोस ने अपने एक ब्रिटिश शिक्षक ई एफ ओटेन को पीटा। क्योंकि प्रोफेसर ने भारतीय छात्रों के खिलाफ नस्लीय टिप्पणी की थी। प्रोफेसर को पीटने के कारण उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज से निकाल दिया गया और कोलकाता विश्वविद्यालय से  निकाल दिया गया। इस घटना ने सुभाष चंद्र बोस को विद्रोही भारतीयों की सूची में ला दिया था। पहली बार दिसंबर 1921 में सुभाष चंद्र बोस को प्रिंस ऑफ वेल्स की भारत की यात्रा को चिन्हित करने के लिए समारोह के बहिष्कार के आयोजन के लिए गिरफ्तार किया गया और जेल में डाल दिया गया।

परंतु सुभाष चंद्र बोस के पिता चाहते थे कि व एक सिविल सेवक बने और इसलिए उन्होंने भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में बैठने के लिए इंग्लैंड भेज दिया। जहां सुभाष चंद्र बोस को अंग्रेजी में उच्चतम अंक के साथ चौथा स्थान प्राप्त हुआ। लेकिन आंदोलन में भाग लेने की उनकी तेरी इच्छा थी इसलिए अप्रैल 1921 में बॉस ने प्रतिष्ठित भारतीय सिविल सेवा से इस्तीफा दे दिया और भारत वापस आ गए। वापस आने के बाद उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सदस्य बनने के लिए अपना घर भी छोड़ दिया। बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए और युवा विंग पार्टी के अध्यक्ष के रूप में भी चुने गए।

इन्होंने कोलकाता में कांग्रेस के एक सक्रिय सदस्य चितरंजन दास के नेतृत्व में काम किया। वह चितरंजन दास ही थे जिन्होंने मोतीलाल नेहरू के साथ कांग्रेस छोड़ दी और 1922 में स्वराज पार्टी का स्थापना की सुभाष चंद्र बोस चितरंजन दास को अपना राजनीतिक गुरु भी मानते थे।

जब चितरंजन दास राष्ट्रीय रणनीति विकसित करने में व्यस्त है तब सुभाष चंद्र बोस ने कोलकाता के छात्रों युवाओं और मजदूरों को जागरूक करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। सुभाष चंद्र बोस भारत को एक स्वतंत्र संघीय और गणतंत्र राष्ट्र के रूप में देखने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।

स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस का एक बड़ा संगठन था। जिसमें सुभाष चंद्र बोस एक मजबूत नेता बन गए और उन्होंने पूरी पार्टी को एक अलग तरह से डालने का साहसिक प्रयास किया। कांग्रेस पार्टी हमेशा उतार रही और कभी विरोध करने की स्थिति में नहीं थी जिसका सुभाष बाबू ने घोर विरोध किया। क्योंकि यह विरोध गांधी के दर्शन के खिलाफ था इसलिए महात्मा गांधी और अन्य नेता सुभाष चंद्र बोस का विरोध किया।

कांग्रेस पार्टी ने उनके हर विचारों का विरोध किया उनका अपमान किया और उनके बुलंद महत्वाकांक्षाओं को दबाने का एक मिशन भी शुरू कर दिया। कांग्रेस के इस युद्धाभ्यास में उन्हें कई बार घुटन महसूस होती थी। जब कांग्रेस का पहला चुनाव था उस समय सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर पूरी कांग्रेस पार्टी के खिलाफ थी। वैसे तो आमतौर पर महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी ही चुने जाते थे लेकिन इस बार सुभाष चंद्र बोस अधिक मतों से विजई हुए। इससे गांधी समूह का अपमान किया जिसके कारण स्वतंत्रता के लिए पार्टियों का अभिमान के प्रति उनकी सोच कम हो गई।

सुभाष चंद्र बोस द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बाहरी समर्थन को स्वीकार करने और स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जर्मनी जापान की यात्रा की । नेता जी ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए बाहर से सैनिकों को प्रेरित करने का निर्णय लिया। जिस पर नेहरू जी ने कहा कि यदि “सुभाष चंद्र बोस बाहर से सैनिकों को लाकर भारत में प्रवेश करते तो मैं तलवार चलाने वाला और उनका विरोध करने वाला पहला व्यक्ति होता”।

आजाद हिंद फौज का गठन

नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों को किसी भी तरह की मदद करने के बिल्कुल खिलाफ थे। आखिरकार 1939 के सितंबर में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया और जैसा कि सुभाष चंद्र बोस ने भविष्यवाणी की थी भारत को भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना गवर्नर जनरल द्वारा एक युद्ध रत राज्य घोषित किया गया था। की ओर से इस समय कांग्रेस पार्टी 7 प्रमुख राज्यों में सत्ता में थी और सभी राज्य सरकारों ने इसके विरोध में इस्तीफा दे दिया।

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सुभाष चंद्र बोस अब महान युद्ध के लिए भारतीय संसाधनों और पुरुषों के उपयोग के खिलाफ एक जन आंदोलन छेड़ दिया। क्योंकि उनके लिए औपनिवेशिक और साहिर राष्ट्रों के खातिर गरीब भारतीयों को और खून बहाने का कोई मतलब ही नहीं था। उनके एक आवाहन पर जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने उन्हें तुरंत कैद कर लिया। जिसके बाद उन्होंने भूख हड़ताल की और उपवास के 11 दिन उनकी तबीयत बिगड़ने लगी जिसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया और उन्हें नजरबंद कर दिया गया क्योंकि अंग्रेज उनका जेल में बंद करने के अलावा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते थे।

लेकिन 1941 में सुभाष चंद्र बोस अचानक गायब हो गए अधिकारियों को बहुत दिनों तक पता नहीं चला कि वह अपने घर से कैसे गायब हो गए। जबकि उनके घर के आसपास चारों तरफ अंग्रेज सैनिक खड़े रहते थे। इन्होंने पैदल कार और ट्रेन से यात्रा की और काबुल में फिर से जीवित हो गए, लेकिन एक बार फिर से गायब हो गए। नवंबर 1941 में जर्मन रेडियो से उनके प्रसारण ने अंग्रेजों के बीच सदमे की लहर तेज कर दी और भारतीय जनता को विद्युतीकरण किया। जिससे भारत की जनता ने यह महसूस किया कि उनका नेता मातृभूमि को मुक्त कराने के लिए एक बड़े प्लान पर काम कर रहा है। इन्होंने भारत के उन क्रांतिकारियों को भी नया विश्वास दिलाया जो कई तरह से अंग्रेजों को चुनौती दे रहे थे।

जर्मनी में दूरी शक्तियों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अंग्रेजों से लड़ने के लिए सेना और अन्य मदद  देने का आश्वासन किया। अब तक जापान एक और मजबूत विश्व शक्ति के रूप में विकसित हो चुका था जिसने एशिया में डच फ्रेंच और ब्रिटिश उपनिवेश ओं के प्रमुख उपनिवेश ओं पर कब्जा कर लिया था। सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी और जापान के साथ गठबंधन किया था। इन्होंने यह महसूस की थी कि पूर्व में उनकी उपस्थिति से उनके देशवासियों को स्वतंत्रा संग्राम में मदद मिलेगी और उनकी गाथा का दूसरा चरण भी शुरू होगा। इनके बारे में ऐसा कहा जाता है कि उन्हें आखिरी बार 1943 की शुरुआत में जर्मनी में कील नहर के पास जमीन पर देखा गया था सुभाष चंद्र बोस दुश्मन के इलाकों को पार करते हुए हजारों मेला दूरी तय करने के लिए पानी के नीचे एक सबसे खतरनाक यात्रा की थी। बॉस अटलांटिक मधेपुरा मेडागास्कर और हिंद महासागर में थे। उस समय जमीन पर हवा में लड़ाई लड़ी जा रही थी परंतु समुंद्र में खदानें थी। एक समय उन्होंने एक जापानी पनडुब्बी तक पहुंचने के लिए रब्बर की बनी डेंगी में 400 मील की यात्रा की जो उन्हें टोक्यो तक ले गए। जहां उनका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया और उन्हें भारतीय सेना का प्रमुख घोषित किया जिसमें लगभग 40000 सैनिक सिंगापुर और अन्य पूर्वी क्षेत्रों से शामिल थे जिन्हें एक और महान क्रांतिकारी रासबिहारी बोस ने एकजुट किया था। इस सेना को रासबिहारी बोस ने सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी जिसे नेता जी ने भारतीय राष्ट्रीय सेना(INA) का नाम दिया और 21 अक्टूबर 1943 को “आजाद हिंद सरकार” नाम से एक सरकार की घोषणा की। भारतीय राष्ट्रीय सेना ने अंडमान और निकोबार द्वीप को अंग्रेजों से मुक्त करा दिया और उनका नाम बदलकर स्वराज और शहीद द्वीप रख लिया गया यहां सरकार ने काम करना शुरू कर दिया।

भारत को पूर्वी मोर्चे से सुभाष चंद्र बोस मुक्त करवाना चाहते थे। उन्होंने इस बात का भी भरपूर ध्यान रखा था कि जापानी हस्तक्षेप किसी भी कोण से उपस्थित ना हो। सेना नेतृत्व प्रशासन और संचार का प्रबंधन केवल भारतीयों द्वारा किया जाता था। इसके लिए सुभाष ब्रिगेड आजाद ब्रिगेड और गांधी ब्रिगेड का गठन किया गया। बर्मा से होते हुए भारतीय राष्ट्रीय सेना ने भारतीय सीमा पर स्थित कॉक्स टाउन पर कब्जा कर लिया। जब सैनिक अपनी मुक्त मातृभूमि में प्रवेश कर गए तब एक मर्मस्पर्शी दृश्य सामने आया। अपने मुक्त मातृभूमि पर प्रवेश करने के बाद किसी ने इस मिट्टी को चूम लिया कोई लेट गया किसी ने धरती मां के इस के टुकड़े को अपने सिर पर रख लिया तो कोई रोया। अब भारतीय राष्ट्रीय सेना के सभी सैनिक अंग्रेजों को बाहर निकालने के लिए दृढ़ हो चुके थे और उन्हें बाहर निकालना चाहते थे और उन्होंने दिल्ली की ओर मार्च करते हुए ” दिल्ली चलो” युद्ध का नारा दिया था।

वहीं दूसरी ओर हिरोशिमा और नागासाकी के ऊपर किए गए बमबारी ने मानव इतिहास को बदल के रख दिया। जिसके परिणाम स्वरूप जापान को आत्मसमर्पण करना पड़ा।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पिछले इंग्लैंड की यात्राओं का प्रभाव भी दिखा गया। क्योंकि सुभाष चंद्र बोस इंग्लैंड के अपने प्रवास के दौरान ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेताओं और क्लेमेंट एटली, आर्थर ग्रीनवुड, हैरोल्ड लास्की, जीडीएच कॉल और सर स्टैफोर्ड क्लिप्स जिनसे सुभाष चंद्र बोस ने भारत के भविष्य के बारे में चर्चा की थी।

भारत के इस महान स्वतंत्रता सेनानी के बारे में यह माना जाता है कि विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी लेकिन इनका शरीर कभी भी बरामद नहीं हुआ था ।उनके लापता होने को लेकर कई तरह की थ्योरी भी सामने आई। भारत सरकार ने भी इस मामले की जांच करने और सच्चाई सामने लाने के लिए कई समितियों का गठन किया। जिसमें से मई 1956 में शाहनवाज समिति ने नेताजी की अनुमानित मृत्यु की स्थिति को देखने के लिए जापान का दौरा किया। वहीं ताइवान के साथ अपने राजनीतिक संबंधों की कमी का हवाला देते हुए केंद्र ने अपनी सरकार से सहायता की मांग नहीं की। लेकिन 17 मई 2006 को संसद में पेश किए गए न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट में यह कहा गया कि “सुभाष चंद्र बोस की विमान दुर्घटना में मृत्यु नहीं हुई थी और रेनकोजी मंदिर की राख उनकी नहीं है।”लेकिन भारत सरकार के द्वारा इन निष्कर्षों को खारिज कर दिया गया था।

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सुभाष चंद्र बोस की जीवनी पर बहुत से फिल्म बने जिनमे से एक निचे दी गयी है , जो हर भारतीय को देखना चाहिए। इस फिल्म को देखने के बाद हर भारतीय के अंदर देश भक्ति का खून दौड़ जाता है।

Read In English

Biography of Subhash Chandra Bose: Netaji Subhash Chandra Bose was one of the greatest freedom fighters of India. He reorganized the Indian National Army and formed the Azad Hind Fauj in 1943, which was started by Rash Behari Bose in 1942. was done. Subhas Chandra Bose visited London to discuss the future of India with the members of the Labor Party during the pre-independence period. But his sudden disappearance from Taiwan was an incredible event. None of which has been thoroughly investigated by successive governments and it is not good at all to keep people in such darkness about one of the most beloved leaders of India ever.

Biography of Subhash Chandra Bose

Subhash Chandra Bose was born on 23 January 1897 in Cuttack. His mother’s name was Prabhavati Devi and father’s name was Jankinath Bose. His father Janakinath Bose was a successful lawyer from Cuttack who also received the title of Rai Bahadur. After this he became a member of the Bengal Legislative Council.

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image source – google ; image credit – amarujala

Subhas Chandra Bose was a very intelligent and honest student but he was not much interested in sports. He did his B.A. Studied in Philosophy from Presidency College. Netaji was greatly influenced by the teachings of Swami Vivekananda and was known for his patriotic fervor as a student. He also considered Vivekananda as his spiritual guru. He went to Cambridge University in London to prepare for his Indian Civil Service. But he returned to India after getting the news of the increasing political activities in India in 21 and left the preparation of civil service incomplete. After this he joined the Indian National Congress and became a part of the campaign to liberate the country.

Subhash Chandra Bose decided to take revenge after reading so many incidents about the exploitation of Indian by the British as well. It is said about him that in 1916, Subhash Chandra Bose beat up one of his British teachers, E F Otten. Because the professor made racial remarks against Indian students. He was expelled from the Presidency College and expelled from the University of Kolkata for beating the professor. This incident put Subhas Chandra Bose in the list of rebellious Indians. Subhas Chandra Bose was first arrested and imprisoned in December 1921 for organizing a boycott of the ceremony to mark the visit of the Prince of Wales to India.

But Subhas Chandra Bose’s father wanted him to become a civil servant and so he sent him to England to appear in the Indian Civil Services Examination. Where Subhash Chandra Bose got the fourth position with the highest marks in English. But it was your desire to participate in the movement, so in April 1921 Boss resigned from the prestigious Indian Civil Service and returned to India. After coming back he also left his home to become an active member of the freedom movement. Later joined the Indian National Congress and was also elected as the president of the youth wing party.

He worked under the leadership of Chittaranjan Das, an active member of the Congress in Kolkata. It was Chittaranjan Das who left the Congress with Motilal Nehru and founded the Swaraj Party in 1922. Subhash Chandra Bose also considered Chittaranjan Das as his political guru.

While Chittaranjan Das was busy developing a national strategy, Subhash Chandra Bose played a major role in sensitizing the students, youth and laborers of Kolkata. Subhas Chandra Bose was eagerly waiting to see India as an independent federal and republic nation.

The Congress had a major organization in the freedom struggle. In which Subhash Chandra Bose became a strong leader and he made a bold attempt to put the whole party in a different way. The Congress party was always taking off and was never in a position to oppose which Subhash Babu vehemently opposed. Because this protest was against Gandhi’s philosophy, Mahatma Gandhi and other leaders opposed Subhash Chandra Bose.

The Congress party opposed his every thought, insulted him and also started a mission to suppress his lofty ambitions. He used to feel suffocated many times in this Congress maneuver. When the first election of the Congress was at that time the picture of Subhash Chandra Bose was against the entire Congress party. Although usually only close associates of Mahatma Gandhi were elected, but this time Subhash Chandra Bose won with more votes. This denigrated the Gandhi group, which reduced their attitude towards the pride of the parties for independence.

Subhas Chandra Bose traveled to Germany and Japan to accept outside support and gain independence during World War II. Netaji decided to inspire the soldiers from outside to get freedom. To which Nehru said that “If Subhash Chandra Bose had entered India by bringing soldiers from outside, I would have been the first to wield a sword and to oppose him”.

Formation of Azad Hind Fauj

Netaji Subhash Chandra Bose was absolutely against helping the British in any way during the Second World War. Eventually the Second World War broke out in September of 1939, and as predicted by Subhas Chandra Bose, India was declared a war-torn state by the Governor General without consulting Indian leaders. At this time the Congress party was in power in 7 major states and all the state governments resigned in protest.

Subhas Chandra Bose now waged a mass movement against the use of Indian resources and men for the Great War. Because there was no point for them to shed more blood on poor Indians for the sake of colonial and civilized nations. There was a tremendous response to one of his calls, as a result of which the British immediately imprisoned him. After which he went on a hunger strike and after 11 days of fasting his health started deteriorating after which he was released and put under house arrest because the British could not spoil anything except putting him in jail.

But they did not know for a long time that Subhash Chandra Bose suddenly disappeared in 1941, how he disappeared from his house. While British soldiers used to stand around his house. He traveled by car and train on foot and was resurrected in Kabul, but disappeared once again. His broadcast from German radio in November 1941 triggered a shock wave among the British and electrified the Indian masses. Due to which the people of India felt that their leader was working on a big plan to liberate the motherland. He also gave new confidence to the revolutionaries of India who were challenging the British in many ways.

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The distance powers in Germany assured Netaji Subhash Chandra Bose of army and other help to fight the British. By now Japan had grown into another strong world power that had captured the major colonies of the Dutch, French and British colonies in Asia. Subhas Chandra Bose had allied with Germany and Japan. He felt that his presence in the East would help his countrymen in the freedom struggle and the second phase of his story would also begin. It is said that they were last seen on land near the Kiel Canal in Germany in early 1943. Subhash Chandra Bose had made a most dangerous journey underwater to cover thousands of fair distances while crossing enemy territory. Had it. Boss Atlantic Madhepura was in Madagascar and the Indian Ocean. At that time the battle was being fought in the air on land but there were mines in the sea. At one point he traveled 400 miles in a rubber dinghy to reach a Japanese submarine that took him to Tokyo. Where he was warmly welcomed and declared the head of the Indian Army consisting of about 40,000 soldiers from Singapore and other eastern regions that had been united by another great revolutionary, Rash Behari Bose. This army was handed over by Rash Behari Bose to Subhash Chandra Bose, which Netaji named the Indian National Army (INA) and on 21 October 1943 announced a government named “Azad Hind Sarkar”. The Indian National Army liberated the Andaman and Nicobar Islands from the British and their name was changed to Swaraj and Shaheed Dweep, where the government started functioning.

Subhas Chandra Bose wanted to free India from the Eastern Front. He had also taken great care that Japanese interference should not be present from any angle. Army leadership, administration and communications were managed by Indians only. For this Subhash Brigade, Azad Brigade and Gandhi Brigade were formed. Passing through Burma, the Indian National Army captured Cox’s Town, located on the Indian border. A touching scene unfolded as the soldiers entered their liberated homeland. After entering their free motherland, some kissed this soil, some lay down, some put a piece of Mother Earth on their head and some cried. Now all the soldiers of the Indian National Army were determined to drive out the British and wanted to drive them out and marching towards Delhi gave the war slogan “Dilli Chalo”.

On the other hand, the bombings of Hiroshima and Nagasaki changed human history. As a result, Japan had to surrender.

The impact of Netaji Subhas Chandra Bose’s previous visits to England was also shown. Because Subhas Chandra Bose during his stay in England, leaders of the British Labor Party and Clement Attlee, Arthur Greenwood, Harold Lasky, GDH Call and Sir Stafford Clips with whom Subhas Chandra Bose discussed the future of India.

It is believed about this great freedom fighter of India that he died in a plane crash but his body was never recovered. The Government of India also constituted several committees to investigate the matter and bring out the truth. Out of which, in May 1956, the Shahnawaz Committee visited Japan to see the status of Netaji’s estimated death. The Center did not seek assistance from its government, citing its lack of political ties with Taiwan. But the Justice Mukherjee Commission report tabled in Parliament on 17 May 2006 stated that “Subhash Chandra Bose did not die in the plane crash and the ashes of the Renkoji Temple do not belong to him.” But these findings were rejected by the Government of India. was rejected.

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हर साल 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को मनाया जाता है।

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हर साल 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को मनाया जाता है।

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1. दिल्ली चलो।
2. तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा।
3. कोई व्यक्ति एक विचार के लिए मर सकता है, लेकिन वह विचार उसकी मृत्यु के बाद एक हजार जन्मों में अवतरित होगा।
4. आजादी दी नहीं जाती, ली जाती है।
5. यदि कोई संघर्ष नहीं है, तो जीवन अपनी आधी रुचि खो देता है- यदि कोई जोखिम नहीं लेना है।
6. चर्चा से इतिहास में कोई वास्तविक परिवर्तन कभी हासिल नहीं हुआ है।
7. अपनी आजादी की कीमत खून से चुकाना हमारा फर्ज है।
8. अपने राष्ट्र के प्रति सदैव निष्ठावान रहने वाले, अपने प्राणों की आहुति देने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले सैनिक अजेय होते हैं।
9. याद रखें, सबसे बड़ा अपराध अन्याय को सहन करना और गलत के साथ समझौता करना है।
10. मेरा अनुभव है कि हमेशा आशा की कोई किरण होती है, जो हमें जीवन से भटकने नहीं देती।
11. जिस व्यक्ति में ‘सनकी’ नहीं होती वह कभी महान नहीं बन सकता। लेकिन इसके अंदर इससे बढ़कर भी कुछ होना चाहिए।
12. राजनीतिक सौदेबाजी का रहस्य यह है कि आप वास्तव में आप से ज्यादा मजबूत दिखें।

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